राज्यसभा चुनाव: तेलंगाना में कांग्रेस की बढ़ी चिंता, केसीआर ने ठोका एक सीट पर दावा

नई दिल्ली। देशभर की 37 राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले चुनाव ने कई राज्यों में सियासी हलचल तेज कर दी है। जहां बिहार में 5 सीटों पर एनडीए की बढ़त लगभग तय मानी जा रही है, वहीं तेलंगाना की दो सीटों ने राजनीतिक समीकरणों को दिलचस्प बना दिया है।
तेलंगाना में अप्रैल में दो राज्यसभा सीटें खाली हो रही हैं। अब तक माना जा रहा था कि सत्तारूढ़ कांग्रेस दोनों सीटें आसानी से जीत लेगी, लेकिन अब मुकाबला पेचीदा होता दिख रहा है। भारत राष्ट्र समिति (BRS) के प्रमुख के. चंद्रशेखर राव ने एक सीट पर उम्मीदवार उतारने का संकेत देकर कांग्रेस की रणनीति को चुनौती दे दी है।
बदला सियासी गणित
विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, बीआरएस के पास 37 विधायक हैं। इनमें से 10 विधायक कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं, जिनकी सदस्यता को लेकर कानूनी विवाद जारी है। बताया जा रहा है कि यदि बीआरएस अपने शेष विधायकों को एकजुट रखने में सफल रहती है तो उसे एक सीट जीतने के लिए केवल चार अतिरिक्त विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होगी।
राज्यसभा की एक सीट के लिए 41 विधायकों का समर्थन जरूरी है। ऐसे में बीआरएस अन्य दलों और निर्दलीय विधायकों से संपर्क साधने में जुटी बताई जा रही है।
कांग्रेस के सामने नई चुनौती
तेलंगाना विधानसभा में कांग्रेस के पास 66 विधायक हैं, साथ ही उसे वाम दल का भी समर्थन प्राप्त है। अब तक पार्टी को उम्मीद थी कि बीआरएस चुनाव मैदान से दूर रहेगी, लेकिन केसीआर के सक्रिय होने से मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एक सीट पर कांग्रेस की स्थिति मजबूत है, लेकिन दूसरी सीट पर उसे रणनीतिक गठजोड़ और विधायकों की एकजुटता सुनिश्चित करनी होगी। पार्टी के भीतर संभावित उम्मीदवारों को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। सूत्रों के मुताबिक, एक सीट पर वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी को फिर से भेजा जा सकता है। वहीं दूसरी सीट के लिए वी. नरेंद्र रेड्डी और सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस सुदर्शन रेड्डी के नाम चर्चा में हैं।
अन्य दलों की भूमिका अहम
राज्य में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के 7 विधायक हैं, जबकि भाजपा के पास 8 विधायकों का समर्थन बताया जा रहा है। ऐसे में यदि बीआरएस इन दलों या निर्दलीयों का समर्थन जुटाने में सफल रहती है तो मुकाबला रोचक हो सकता है।
कुल मिलाकर, तेलंगाना की दो राज्यसभा सीटों का चुनाव अब महज औपचारिकता नहीं रह गया है। अंतिम नतीजा विधायकों की निष्ठा, कानूनी स्थिति और अंतिम समय की राजनीतिक रणनीति पर निर्भर करेगा।





