बस्तर की पारंपरिक कला: ढोकरा, टेराकोटा और आयरन क्राफ्ट की अनोखी धरोहर

बस्तर, छत्तीसगढ़ – छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले की पारंपरिक कला देश-विदेश में अपनी खास पहचान बना चुकी है। इस क्षेत्र की कला में ढोकरा, टेराकोटा, बेल मेटल, काष्ठ कला और आयरन क्राफ्ट जैसी कलाएं शामिल हैं, जो जनजातीय संस्कृति, प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक प्रतीकों को जीवंत रूप में दर्शाती हैं।
स्थानीय कारीगर पीतल, धातु, मिट्टी, लकड़ी और सूखी लौकी जैसी प्राकृतिक सामग्रियों का इस्तेमाल करके आकर्षक और बारीक कलाकृतियां तैयार करते हैं। ये कलाकृतियां केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी खूब सराही जाती हैं।
ढोकरा और बेल मेटल कला:
बस्तर की ढोकरा कला सबसे प्रसिद्ध मानी जाती है। इसमें ‘लोस्ट वैक्स टेक्निक’ का प्रयोग किया जाता है, जिसके माध्यम से पीतल की मूर्तियां, दीपक और सजावटी वस्तुएं बनाई जाती हैं। बेल मेटल कला ढोकरा की विस्तारित शैली है, जिसमें अलग-अलग धातुओं से कलात्मक शिल्प तैयार किए जाते हैं।
आयरन क्राफ्ट और लकड़ी की कला:
बस्तर आयरन क्राफ्ट, जिसे गढ़ा लौह कला भी कहा जाता है, लोहे की घरेलू और सजावटी वस्तुओं के लिए लोकप्रिय है। इसमें काले पॉलिश और विशेष डिज़ाइन इसे विशिष्ट बनाते हैं। नारायणपुर की लकड़ी कला में देवी-देवताओं, जनजातीय जीवन और जानवरों की नक्काशी की जाती है, जिसे विदेशी संग्रहालयों में भी प्रदर्शित किया गया है।
टेराकोटा और तुम्बा आर्ट:
टेराकोटा कला में मिट्टी से घोड़े, हाथी और पारंपरिक मूर्तियां बनाई जाती हैं, जबकि तुम्बा आर्ट में सूखी लौकी पर जलाकर डिज़ाइन तैयार किए जाते हैं। ये कलाएँ ग्रामीण जीवन और बस्तर की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण हैं।
बस्तर की ये पारंपरिक कलाएँ न केवल स्थानीय कलाकारों की मेहनत और प्रतिभा को दर्शाती हैं, बल्कि भारतीय शिल्प और संस्कृति की वैश्विक पहचान को भी मजबूती देती हैं।





