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SC का ऐतिहासिक फैसला: किरायेदार नहीं जता सकेगा मालिकाना हक, जानें प्रॉपर्टी ओनर्स के अधिकार

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने किरायेदारी कानून से जुड़े एक ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट कर दिया है कि कोई भी किरायेदार, जिसने किसी वैध किरायानामे (Rent Agreement) के तहत संपत्ति का कब्जा लिया हो, वह बाद में मकान मालिक के स्वामित्व पर सवाल नहीं उठा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसा कब्जा “अनुमति-आधारित” (Permissive Possession) होता है, इसलिए किरायेदार उस संपत्ति पर “विरोधी कब्जे” (Adverse Possession) का दावा भी नहीं कर सकता।

यह ऐतिहासिक फैसला जस्टिस जे. के. महेश्वरी और के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सुनाया, जिससे 1953 से चल रहे ‘ज्योति शर्मा बनाम विष्णु गोयल’ केस का अंत हो गया। इस निर्णय ने ट्रायल कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट के पुराने फैसलों को भी रद्द कर दिया।

70 साल पुराना किरायेदारी विवाद

मामला एक दुकान से जुड़ा था, जिसे वर्ष 1953 में किरायेदार पक्ष के पूर्वजों ने रामजी दास नामक व्यक्ति से किराए पर लिया था। दशकों तक किराया रामजी दास और बाद में उनके उत्तराधिकारियों को दिया जाता रहा। 1999 में लिखी गई एक वसीयत के तहत संपत्ति का स्वामित्व रामजी दास की बहू ज्योति शर्मा को मिला। व्यवसाय के विस्तार के लिए ज्योति शर्मा ने दुकान खाली कराने की मांग की, जिसके बाद विवाद शुरू हुआ।

किरायेदारों ने दावा किया कि संपत्ति रामजी दास की नहीं, बल्कि उनके चाचा सुआलाल की थी और 1999 की वसीयत जाली है।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने किरायेदारों के दावों को “बिना प्रमाण और कल्पना पर आधारित” बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि किरायेदारों द्वारा वर्षों तक किराया चुकाना स्वयं यह साबित करता है कि वे मकान मालिक के अधिकार को स्वीकार करते रहे हैं।

कोर्ट ने स्पष्ट किया —

“जो व्यक्ति किरायानामे के तहत संपत्ति का उपयोग करता है और नियमित किराया देता है, वह बाद में मकान मालिक के स्वामित्व को चुनौती नहीं दे सकता।”

अदालत ने किरायेदारी को कानूनी अनुमति के आधार पर प्राप्त कब्जा बताया, जो कभी भी शत्रुतापूर्ण नहीं माना जा सकता। हालांकि, न्यायिक सौजन्य बरतते हुए अदालत ने किरायेदारों को छह महीने का समय दिया है ताकि वे बकाया किराया चुकाकर शांतिपूर्वक दुकान खाली कर सकें।

मकान मालिकों के लिए बड़ा राहतभरा निर्णय

यह फैसला उन लाखों मकान मालिकों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है जो वर्षों से किरायेदारी विवादों में फंसे हैं। भारत के किराया नियंत्रण कानून और मॉडल टेनेंसी एक्ट, 2020 के अनुसार, मकान मालिक को किराया बढ़ाने, अनुबंध उल्लंघन की स्थिति में बेदखली करने और व्यक्तिगत उपयोग के लिए संपत्ति वापस मांगने का अधिकार प्राप्त है।

इसके अलावा, यदि किसी संपत्ति में बड़े मरम्मत कार्य की आवश्यकता हो, तो मकान मालिक अस्थायी रूप से किरायेदार से घर खाली करवाने का अधिकार भी रखता है।

इस ऐतिहासिक निर्णय ने यह साफ संदेश दिया है कि किरायेदारी “मालिकाना हक” नहीं देती — बल्कि यह सिर्फ एक अस्थायी कानूनी अनुमति है, जो मालिक के अधिकारों के अधीन रहती है।

 

चतुर मूर्ति वर्मा, बलौदाबाजार

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