रायपुर | छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में धार्मिक आस्था की आड़ में किया गया एक बड़ा ज़मीन घोटाला उजागर हुआ है, जिसमें एक व्यक्ति ने खुद को फर्जी महंत घोषित कर न केवल मठ की करोड़ों की जमीनें बेचीं, बल्कि इसके पीछे प्रभावशाली अफसरों, रसूखदारों और जमीन माफिया की मिलीभगत भी सामने आ रही है।

 फर्जी महंत और 300 करोड़ की जमीन का सौदा

रायपुर के वॉलफोर्ट सिटी निवासी आशीष तिवारी ने खुद को ‘महंत राम आशीष दास’ घोषित कर दिया और जैतूसाव मठ का महंत बन बैठा। आश्चर्यजनक रूप से इस व्यक्ति की पत्नी और दो बच्चे हैं, लेकिन उसने आधार कार्ड में नाम और सरनेम में फेरबदल कर खुद को साधु के रूप में दर्शाया।

आरोप है कि उसने रायपुर के धरमपुरा स्थित जैतूसाव मठ की 100 एकड़ से ज्यादा जमीन को फर्जीवाड़े से बेच डाला। इन जमीनों की कीमत 300 करोड़ से अधिक आंकी जा रही है। रजिस्ट्री उन लोगों के नाम पर की गई है, जो पहले से मोटे घोटालों में फंसे हैं, जैसे: हरमीत खनूजा (भारत माला घोटाले में जेल में बंद), अनवर ढेबर (शराब घोटाले में आरोपी), और विकास शर्मा।

ट्रस्टियों की जांच और खुलासा

मामला सामने आने के बाद जैतूसाव मठ ट्रस्ट ने पूरे घटनाक्रम की जांच करवाई। खुलासा हुआ कि आशीष तिवारी उर्फ ‘महंत’ राम आशीष दास ने धरमपुरा की 100 एकड़ जमीन, दतरेंगा में 17.5 एकड़ और अभनपुर के ओगेतरा में 30 एकड़ की भूमि फर्जी रूप से बेची है। अब तक की जांच में सामने आया है कि करीब 50 करोड़ रुपये का अवैध लेन-देन हुआ है।

विशेष बात यह है कि इसमें एक मुस्लिम व्यक्ति शब्बीर हुसैन का भी नाम सामने आया है, जिसका फर्जी नाम ‘समीर शुक्ला’ बताकर फर्जी आधार कार्ड बनाया गया। इन फर्जी दस्तावेजों से मठ की संपत्ति बेची जा रही थी।

 प्रशासन की सख्ती – जमीनें लौटाई गईं

मामले के उजागर होने के बाद कमिश्नर महादेव कावरे ने जांच में 75 एकड़ में से अब तक 62 एकड़ जमीन की बिक्री रद्द कर मठ को लौटाई है| पहले 5 एकड़,हाल ही में 57 एकड़,अब भी 13 एकड़ जमीन बची है, जिसकी जांच जारी है।

तहसीलदार की भूमिका भी संदिग्ध

जैतूसाव मठ के प्रबंधक स्वयं रायपुर कलेक्टर होते हैं, लेकिन दस्तावेजों से तत्कालीन तहसीलदार अजय चंद्रवंशी ने कलेक्टर का नाम ही हटा दिया और आशीष को मालिकाना हक दे दिया।

चौंकाने वाली बात यह है कि अजय चंद्रवंशी का तबादला पहले भी 100 से अधिक फ्लैटों की रजिस्ट्री में गड़बड़ी के चलते किया गया था। फिलहाल वह राजिम (गरियाबंद) में पदस्थ है।

जनता से धोखा और श्रद्धा के नाम पर खेल

इस मामले ने एक बार फिर साबित किया है कि धार्मिक ट्रस्टों और मठों की संपत्तियों में पारदर्शिता की सख्त ज़रूरत है।
एक साधारण व्यक्ति, पत्नी-बच्चों वाला, खुद को महंत बताकर करोड़ों की जमीनें बेचता रहा और अफसरों की मदद से प्रामाणिक दस्तावेज भी तैयार करा लिए।

इस जमीन घोटाले ने न केवल भारत माला, शराब घोटाले और जमीन माफिया नेटवर्क को एक साथ जोड़ा है, बल्कि ये भी दिखा दिया है कि कैसे प्रशासनिक लापरवाही, अधिकारियों की मिलीभगत और फर्जी दस्तावेजों से धार्मिक संपत्तियों का दोहन किया जा रहा है।

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By चतुर मूर्ति वर्मा, बलौदाबाजार

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